जय वाल्मीकि जी।
वाल्मीकि समुदाय के महान अभियंता (इंजीनियर) सूय्या जी।
आज का मेरा विषय वाल्मीकि समुदाय के महान इंजीनियर सूय्या जी के इतिहास पर चर्चा करना है। बहुत से बुद्धिजीवी साथी सूय्या के नाम से पहले भी परिचित होगे। लेकिन फिर भी इंजीनियर सूय्या सिर्फ पुस्तकों तक ही सीमित है। जमीनी स्तर पर उनके इतिहास कि जानकारी बहुत कम पहुँची हैं।
प्राचीन समय कि घटना है जम्मु कश्मीर में उत्पल वंश के शासक अंवतीवर्मन का शासन(855-885 ई.) था। उसी समय उनके राज्य में एक भयंकर अकाल पड़ा था। इस अकाल से बचने के लिए पानी की आवश्यकता थी। लेकिन पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। ऐसे में वाल्मीकि समुदाय के महान इंजीनियर सूय्या जी सामने आए। तथा राजा अंवतीवर्मन से आज्ञा लेकर उन्होने अपना कार्य शुरु किया।
अपनी श्रेष्ठ बुद्धि व कला से उन्होने पत्थर के बांध के द्वारा नदी के मार्ग को बदल दिया। सूय्या ने सिंधु और वितस्ता नदियों के मेल को तोड़ा और महापद्म झील बनाने के लिए वितस्ता के किनारे-किनारे सात योजन तक तटबंध बनवाया। जिससे देश के बहुत बड़े भाग में सिंचाई का प्रबन्ध हो सका। जिससे न केवल आकाल से बचाव हुआ। बल्कि कश्मीर और भी समृद्ध हुआ। और एक बड़ी समस्या से कश्मीर के लोगों को राहत मिली। और सूय्या कि इस योग्यता के कारण राजा अंवतीवर्मन व सूय्या दोनों ही इतिहास में अमर हो गए थे। राजा अंवतीवर्मन ने सूय्या के नाम पर एक नगर का नाम सूय्यापुर भी रखा था। जो वर्तमान सपोरा (जिला -बारामुला) के नाम से जाना जाता है।
सूय्या के पालन पोषण से जुड़ी कथा बहुत ही आश्चर्य जनक हैं। कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिनी के अनुसार वह साफ सफाई करने वाली एक चाण्डाल स्त्री सूय्या के दत्तक पुत्र थे। जो उन्हें सफा-सफाई करते हुए मिला था। लेकिन विचित्र बात है कथा के अनुसार चांडाल स्त्री ने सूय्या को कभी स्पर्श करके अपवित्र नहीं किया था। बल्कि एक अन्य स्त्री के द्वारा उसका पालन पोषण करवाया था। वह उसके पालन पोषण के लिए उस स्त्री को पैसे देती थी। लेकिन यह कथा संभव प्रतीत नहीं होती हैं। क्योंकि ऐसा कैसे हो सकता है कि वह उसे साफ-सफाई करते हुए मिला और उसने उसे स्पर्श न किया हो। इस कथा से प्रतीत होता है कि अकाल के समय में और कोई रास्ता नहीं था। इसलिए एक चांडाल पुत्र को बांध बनाने के लिए अनुमति तो मिल गई थी। लेकिन एक चांडाल पुत्र द्वारा कश्मीर को बांध बनाकर समृद्ध करने की घटना उन्हें हजम नहीं हो रही थी। दुसरा इंजीनियर सूय्या को जाना भी उसकी चंडाल माता सूय्या के नाम पर जाता था। तथा अपने समृद्धि के दिनों में सूय्या ने जो पुल बनावाया व ब्राह्मणो को जो गांव (सूय्या कुंडला) दान में दिया उन दोनों का नाम ही इस महान इंजीनियर ने अपनी माता के नाम पर रखा था। ऐसे में उसका चांडालो से रिश्ता तोड़ना मुश्किल था। इसलिए ही शायद उसे चांडाल स्त्री का दत्तक पुत्र घोषित किया गया। तथा पालन पोषण करते व चांडाल स्त्री द्वारा उसे न छूने कि कथा को प्रचलित किया गया। ताकि इंजीनियर सूय्या को किसी तरह गैर अस्पृष्यत घोषित किया जा सके। लेकिन मेरे दृष्टिकोण में वह एक चांडाल(वाल्मीकि)इंजीनियर ही थे। वाल्मीकि समुदाय के महान इंजीनियर सूय्या समर्पित मेरा एक चित्र।
वाल्मीकिधर्मी शुभम बडलान
(आदि साहित्य संघ)
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