हमने माँ शबरी के बारे बस यही धारणा सुनी व मानी है जो टैलीविजनों द्वारा हमे दिखाया गया कि शबरी एक बुजुर्ग भीलणी थी जो राम भक्त थी और राम ने उसके झूठे बेर खा कर उसे सम्मान दिया। जबकि यह तर्कसंगिग नहीं और ना ही सत्य है। दक्षिण भारत में स्थित तुंगभद्रा नदी के नजदीक एक सरोवर पम्पासर पर बना बहुत ही ख़ूबसूरत आश्रम ,जो माँ शबरी का आश्रम था। यह आश्रम विश्व-विख्यात था जहाँ लोग ज्ञान लेने आया करते थे।माँ शबरी जिन्होंने मातंग मुनि से योगविशिष्ठ ज्ञान ग्रहण कर सृष्टिकर्ता वाल्मीकि जी की शिक्षाओं का अपने आश्रम में रहते हुए प्रचार किया। जब राम व लक्ष्मण भटकते भटकते माँ शबरी के आश्रम पहुँचे तो सुरक्षाकर्मियों ने उन अजनबियों को बंधी बना लिया और माँ शबरी के पास ले आये। उस समय माँ शबरी बेर खा रही थी ,जो बेर मीठे नहीं थे उन्हें वह फैंक रही थी तो राम ने चतुरता दिखाते हुए जमीन पर पड़े बेर खाने शुरू कर दिए ताकि वह दया के पात्र बन सके। इतना ही नहीं जो आजतक हम सुनते आए है कि सरस्वती ही संगीत की देवी है,यह भी झूठ है। र्क झूठ को अगर लगातार बोला जाए तो वह सत्य बन जाता है ,उसी तरह सरस्वती को जबरदस्ती संगीत की देवी बनाया गया। जबकि संगीत इतिहास में कही भी सरस्वती का जिक्र आता ही नहीं ,ना ही किसी संगीत शास्त्र में । जब आप संगीत का इतिहास पढोगे तो सारी कड़ियां आदिवासियों से ही जुड़ी मिलेगी। जिसमें कुशी-लव,लंकापति रावण के साथ साथ माँ शबरी का जिक्र आता है कि माँ शबरी संगीत कला की महारथी थी और उन्हें ही संगीत की देवी से नवाजा गया है।
विक्की देवान्तक
Aap ke Dwara di gayi jankaari Ke liye Bhut bhut Aabhar
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