गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

रक्षस से राक्षस

अक्सर हमें कहानियों,चल चरित्रों,ग्रन्थों द्वारा बतलाया व दिखाया जाता है कि बीते युगों में देवों और इंसानों के इलावा एक और जीव धरती पर थे,जिन्हें राक्षस कहा जाता था। जो खूंखार किस्म के होते थे और उनका कार्य मानव मांस भक्षण,लूटपाट,देवताओं के साथ युद्ध करना था। राक्षसों की मनघड़ित रुपरेखा का भी प्रचलन किया गया कि उनके बड़े-बड़े नाख़ून,तीखे दांत,घने बाल, बदसूरत चहरा होता है। 

लंकापति रावण,हिरण्यकश्यप,शंखचूड़,तक्षक आदि को राक्षसों की सूचि में रखा गया है। जबकि सत्य इसके बिलकुल विपरित है। राक्षस कोई देव या मानव से अलग प्रजाति नहीं थी। बल्कि राक्षस एक संस्कृति का नाम था। असल में ये शब्द "रक्षस" था जिसका अर्थ था रक्षा करने वाले।  लेकिन समय और इतिहासिक मार ने रक्षस को राक्षस बना दिया। रक्षस संस्कृति भारत के मूलनिवासी राजाओं द्वारा शुरू की गयी थी,जिनमें लंकापति रावण,शंखचूड़,हिरण्यकश्यप आदि शामिल थे। इस संस्कृति से जुड़े दल को रक्षस दल कहा जाता था। जिनका कार्य पर्यावरण की रक्षा करना था। यह रक्षस दल पर्यावरण को नुकसान पहुचाने वाले हवन,यज्ञों और पशु बलियों के खिलाफ था और इनको रोकने के लिए वचनबद्ध था। हवन-यज्ञों के नाम पर फल,फूल,अनाज,वृक्ष आदि को अग्नि में भस्म कर दिए जाता था ,इसलिए रक्षस दल इसका घोर विरोधी था । शास्त्रों और ग्रन्थों के मुताबिक पहले हवन-यज्ञों में पशु बलि का भी प्रचलन था,जिसको रक्षस दल ने बन्द करवाया।

धर्म के ठेकेदारों ने इसी कारण महान संस्कृति को  गलत तरीके से प्रचलित कर रक्षस जैसे महत्वशील शब्द को राक्षस बना दिया।

विक्की देवान्तक

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